वह अकेला
वह अकेला
वह अकेला
जो बैठा है
वहां कई घंटों से
पगडंडियों से सटे गुजरती नई
बनी सड़क के किनारे।
वह हताश है
गुमसुम है।
थका है हारा है।
अगले दस दिन में
रोपनी शुरू होगी
अपने उसी फटे पुराने
झोला के साथ गांव से उन्नीस कि. मी.
दूर शहर के लिए
सामान की तरह वहां जाने वाली
ऑटो में ठांसा जाएगा।
करे तो क्या करे
गरीबी है
मज़बूरी है।
दो पैसा बजेगा
रास्ते का खर्चा निकल जाएगा
शौक नवाबी;
बीड़ी, गुटखा, पान, सिगरेट
पूरा हो जाएगा।
वह अकेला
चुपचाप एक दिन
दो हो जाएगा
फिर दो से पांच भी हो जाएगा।
यही उसकी शान है
अलग पहचान है।



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