पटरी पर औरत

 पटरी पर औरत



पहले शहर में थी ट्रेन

और ट्रेन की पटरी

अब गांव से गुजरती है ट्रेन

और ट्रेन की पटरी भी

अब शहर की धमक 

गांव में है

और गांव में भी शहर बसने लगा है।

फिर शहर की औरत

गांव की औरत

क्या फर्क दोनों में?

फिर भी देखा

एक भोली 

अनजान सी

निडर या फिर थोड़ी डरी भी

गांव की औरत

गांव के पटरी पर

स्टेशन के पास बेधड़क जा रही थी

सस्ती लाल साड़ी में लिपटी

सिर पर एक मोटरी

एक दिशा का संधान किए

जा रही थी।

मेरा उससे

उसका मुझसे,

कोई परिचय नहीं

कोई वास्ता नहीं

कोई पहचान नहीं

मगर फिर भी मुझे 

वो जानी सी

पहचानी सी लगी थी।

उसका पटरी पर चलना 

शायद उसके जल्दी का भान था

या फिर कोई आम बात

जैसे गांव की सड़क पर चलना।

किसी छोटी सी मंज़िल तक पहुंचना

या फिर मंज़िल से अगली मंजिल तक निकल जाना।



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