मैं पंछी
मैं पंछी
मैं पंछी उडूं स्वच्छंद
चाहे जहां
यहां या वहां।
चढूं पेड़ों पर या
उडूं बागों में।
नहीं जानती,
कल ये मेरे ख्वाब होंगे पूरे!
लोग बढ़ रहे हैं
पहाड़ पिघल रहा है
नदी सूख रही है
समंदर उमर रहा है,
पेड़ कट रहे हैं
जंगल उजड़ रहा है
खेत जा रहा है
लोग घर बना रहे हैं
बड़े बड़े महल बन रहे हैं
हवा चीत्कार रही है
कहीं सूखे पड़ रहे हैं
कहीं बाढ़ आ रही है।
और मेरे ख़्वाब-
मैं पंछी उडूं स्वच्छंद
चाहे जहां
यहां या वहां।
चढूं पेड़ों पर या
उडूं बागों में।
नहीं जानती,
कल ये मेरे ख्वाब होंगे पूरे!



Comments
Post a Comment