थक गए पाँव मेरे - ग़ज़ल


थक गए पाँव मेरे अब चला नहीं जाता।
यहाँ रुकूँ, वहां जाऊं कोई नहीं बताता।।
जिसकी जितनी ताक़त यहाँ, या रब
वो उतना बेरहम बन सताता।
हमदर्द बनके वो शैतान यहां
साथ मेरे हमदर्दी जताता।
हूँ बेख़बर यहाँ , मेरी ख़बर लो
बदगुमां शहर भी नाम नहीं बताता।
लिखी है यही किस्मत मेरी तो सही
तड़पाने दो चाहे जितना है तड़पाता।

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