जी हां आपने सही सुना.... (कविता)

मन

जी हां आपने सही सुना,
मैं मन हूँ।
में स्वतः चलता हूँ,
जिधर मन फिरता हूँ।
भ्रम मात्र, 
मैं किसी के वशीभूत।
सृष्टि काल से 
मैं गतिमय
कभी रुकी
कभी बेबाक चलती बनी।
जी हां आपने सही सुना,
मैं मन हूँ।

चहूँ ओर की सृष्टि
और विध्वंश
सब में स्थिर और  गतिशील
मैं हूँ।
जी हां आपने सही सुना,
मैं मन हूँ।
क्षण भर को मैं मृग मरीचिका,
और फिर प्रत्यक्ष भी मैं।
कभी सच का रूप,
कभी झूठ का अवतार
बस मैं ही मैं हूँ।
जी हां आपने सही सुना,
मैं मन हूँ।
आज पहचान मेरी
कल गुमनाम 
हाँ यही अदा मेरी,
शायद आप न समझें
पर कोशिश जारी रखिये
जी हां आपने सही सुना,
मैं मन हूँ।
- एस एस सहर्ष


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