रास्ते में (कविता)



एक दिन यूँ ही जाना पड़ा
उस रास्ते में
कोई एक बार
या दो बार।
मन भर्रा गया
एक लघु सर्प
को पड़ा देख कर
रह गया यूँ ठिढककर।
दृश्य ऐसा की कपा दे
एक दंश में मिटा दे
मन बोला रघु कृपा कर
चुपचाप कोई दूजा पथ धर।
वो पड़ा रहा देर तक
ढली न जब उस शाम तक
जाते पथिक से उसकी ख़बर ली
कहा कोई विषधर उसे
कोई लघु सर्प मात्र।

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