मुमकिन है -ग़ज़ल



मुमकिन है के इस अंधेरे में
कोई चराग ले निकल आए।
गिरता डगमगाता फिर कोई
यूँ संभल जाए।।
उसे बढ़ने तो दो 
क्या पता वो भी कल खिल जाए।
जाता है, उसे जाने दो
हो सके उसकी मंज़िल मिल जाए।
दिया ज़ुबाँ तो निभा लो
भले हाथ से ये दिल जाए।
दो चादर अगर दे सको 'सहर्ष'
मुमकिन है अपनी नींद से हिल जाए।

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