वो उफ़ तक नहीं करते -(कविता)

वो उफ़ तक नहीं करते।
हम तो बस यूं ही मरते।।
किस्मत ही हमारी ज़र्द
दूजा कोई रंग नहीं भरते।
हम मुस्कुराएँ कभी शौक-ऐ-फ़ज़ूल
बस ख़ामोश आहें भरते।
बच्चों की सँवर जाए ज़िन्दगी
इसलिए दिन रात एक करते।
जीना मुहाल हुआ तो क्या
उनके सलामती की दुआ करते।

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