तेरे हक़ के उजाले - ग़ज़ल



तेरे हक़ के उजाले, तेरे हक़ में न सही
कोई बात नहीं।
अपनी उम्र से लम्बी हो
ऐसी कोई रात नहीं।
मज़ाक में ही सही
कह दी जो बात कहनी थी,
वरना कोई बात नहीं।
वो नादान उलझ गया
झूठे सवाल-जबाब में
है उसका कोई जज़्बात नहीं।
आओ 'सहर्ष' घूम आएं बाहर कहीं
अब यहां वो बात नहीं।

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