सनसनाती रात और... -ग़ज़ल
सनसनाती रात और हाल-ए-दिल की बात।
आज हुई जाकर दोनों की बात।।
कभी ये आँखें इसे देखती, कभी उसे।
लफ्ज़ हिलते मगर ज़ुबाँ पर नहीं आती बात।।
ये कैसी बेबसी थी, कैसी इज़तराब।
मौत सामने खड़ा, हो रही थी बात।।
हमनवां हमसफ़र हुए थे रुख़सत।
फिर भी छिपी थी जाने कौन सी बात।।
नाम के थे आदम बचे, वीराने में।
बस पूरी हो गयी थी अधूरी बात।।
निवाला भी मयस्सर नहीं था।
गली में सन्नाटे में हो रही थी इंसानियत की बात।।
लाज के मारे या हालात के मारे, नहीं आये बाहर।
बस खुल के कर ली मौत से बात।।
कौन था ज़िम्मेदार, सवाल नहीं।
कुछ उघड़ गयी थी, कुछ छुप गयी थी बात।।




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