था ये कैसा इश्क़... - ग़ज़ल

था ये कैसा इश्क़ कि इकरारनामा न हुआ।।
हो गया झगड़ा कि सुलहनामा न हुआ।।

हम तो चाह बैठे थे उन्हें दिल से,
उनकी तरह दिल को आज़माना न हुआ।

कुछ पल के मेहमां बने वो मेरे तसव्वउर में,
उन्हें ख़्याल था किसी का, ज़रा ठहरना न हुआ।

कुछ कहना भी था, कुछ सुनना भी था,
पर इश्क़ का यूँ सरेआम बताना न हुआ।

बेख़बर होके बिखर तो गए थे मुहब्बत में उनके,
कि फिर से तारों का टिमटिमाना न हुआ।

न जाने कैसे कर गयी थी वो ख़ामोश हमें,
कि फिर से मस्त परिंदों सा चहचहाना न हुआ।


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