कई चेहरे हैं मेरे... -ग़ज़ल


कई चेहरे हैं मेरे, साथ आपके रहता हूँ।।
गर दम है तो पकड़ो, खुले आम कहता हूँ।।

पकड़ा भी गया कई बार यहाँ,
छूट गया फिर, साथ अपने वफ़ादार रखता हूँ।

वो डाल देते हैं कपड़े चेहरे पर मेरे,
जब भी यकसां कहीं पकड़ा जाता हूँ।

मेरी भी ज़िन्दगी, मेरा भी एक परिवार है,
तो फिर बताओ, मैं क्या गुनाह करता हूँ।

इसकी गाड़ी, उसका घर निशाना,
कभी रात में तो, कभी दिन में काम करता हूँ।

रहता है उस वर्दी का रहम हमेशा,
जो कई बार हाथ में, फिर हाथ से चला जाता हूँ।

ये बात गैर कि, वर्दी ही मेरा दोस्त, वर्दी ही मेरा दुश्मन,
कभी कभी इसी दहशत में, जीता मरता हूँ।

'सहर्ष' है मुझे भी ईमानदारी का इल्म,
जितना हाथ लगता है, उसके बराबर हिस्से करता हूँ।



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