सहज सरल व सुंदर (कविता)

सहज सरल व सुंदर रूप
आ गया मैं भी चक्कर में
रंग भूरा और तीखी चोंच
पतले पाँव और हल्का बदन
देखा दो झगड़ रहे
कोतुहल बस 
मैं दूर खड़ा रहा
दोनो को झगड़ता 
बस देखता रहा।

फिर क्या
छीना झपटी
यूँ चल पड़ा
आंधी गहरे नींद से
ज्यों उठ खड़ा हुआ।
पंजों की मार
तो कभी चोंच हथियार
एक दूजे को
जैसे हुआ खून सवार
क्षण बीते
एक धरासायी हुआ
व्यग्र मन परेशान
जो कदमों 
के साथ जा पास
खड़ा हुआ।
तब से पड़ा शरीर
हो जीवंत
उठ खड़ा हुआ।
लो ये क्या समझा
क्या हो गया।
न खून, न ये 
हाथापाई था।
दोनों की मस्ती थी
और बस अंगड़ाई था।
ठगा महसूस
चुपचाप
नीरव निःशब्द 
बस चल पड़ा।

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