ऐसी भी क्या दुश्मनी... -(कविता)

ऐसी भी क्या दुश्मनी
के
एक दूसरे से यूँ झगड़ पड़े
एक ने जान गवाई
एक के चेहरे पे कुटिल 
हंसी आयी।
प्यारे तो हैं दोनो ही पशु
कुछ सामाजिक पशुओं को।
उस शाम मैं बना
बस मौन प्रत्यक्षदर्शी
जब दोनो के बीच में
फंसी निस्सहाय
बेचारी अकेली
करती रही म्याऊं की क्रंदन
इससे परे वो दुष्ट आततायी
लगे उसका छीनने प्राण
मैं पथिक जाता मौन
ठीढक गया
और चल पड़ा 
पल-पल पड़ते 
क्षीण आवाज़ की तरफ़
यथासामर्थ्य 
डांटा दोनो को,
नहीं माना
जब उठाया एक 
पत्थर, 
दे मारा
फूट गए दोनो।
ज़मीन पर कराहती
पड़ी रही वो बिल्ली
दी मैंने कुछ आवाज़
ज़बाब में गर्दन हिलायी
बीच-बीच में 
मैं 
डांटता दोनो को
क्षणिक संतुष्टि पा
मैं चला अपने पथ को
फिर चुपचाप।
आज बीते हुए 
दो दिन
देखा उसी जगह 
आस-पास कहीं
थी वो पड़ी यूँ ही नहीं
सांसें टूट गयी थी 
शरीर छिन्न भिन्न
पड़ा था
 न जाने कब से
दो ताकतवर के बीच
एक हार चुका था 
अपनी जान।
या
फिर एक 
ताकतवर और एक
कमज़ोर के षड़यंत्र
ने 
ले ली थी 
दूसरे
दुर्बल की जान
यही सोच शेष
के साथ
निकल पड़ा
भारी
कदमों से
वहां।
भोंकते वो 
वहशी कुत्ते
अब भी
जेहन 
में थे
करते 
परेशान मुझे...



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