मैं और...(महामारी की कविता)
आज भी शाम ढल रही थी।
पास की समां भी मचल रही थी।।
कोई डर था कैद मेरे मन में।
पर मैं था मस्त परिंदा गगन में।।
था मुसाफ़िर सफर का क्या करता।
अक्सर यूँ अकेले में आहें भरता।।
कमाया था पैसे और जमा सामान
साथ ले बैठा था कई सारे अरमान।।
अचानक से कोई ख़बर आ गयी
जैसे हवा इस शहर से उस शहर चली गयी
लोगों में मची होड़ और हंगामा हुआ
पहले न जैसे कोई फिर समां हुआ
मालिक मकान के लगे दम दिखाने
उजड़ गए बेघर के आशियानें
सरकार ने भी कैसी हरकत की
लोगों ने दुआखाने में शिरकत की
ख़बर लॉकडॉन की ऐसे फैली जैसे ज़हर
क्षण में बंद हुए शहर के शहर
अब न ठिकाना सिवाय बेबसी के
मुझपे पड़ती आंखें जैसे मयकसी के
जिसका था अपना घर वो घर गए
हम बेघर तो जैसे मर गए
धारा लगी ऐसी की सड़क पड़े सूने
पूछा खुद से क्या ख़ता की तूने
सड़कों ये मज़दूरों बेबस बेघर की फ़ौज
बाक़ी लोगों की थी जैसे अपने मौज
कोई इस कोने कोई उस कोने भागा
तोड़के पुलिस के हमले का धागा
भूखे ठहरे बाहर ही मिला जगह जहां
फैला दिया कपड़ा बनाया अपना जहां
चल दिये कुछ पैदल कुछ की हुई मौत
आख़िर ज़िंदगी को मिल ही गयी उसकी सौत
सुबह शाम और दिन बदले
कोरोना ने अपने तेवर बदले
संख्या हुई एक से शुरु तो कब रुकी
बूढ़ों की हिम्मत टूटी अधेड़ों की सांस रुकी
चीन का किया उठाने लगा सारा जहां।
अपने-अपने लोगों को बुलाने लगा जहां।।
हवा ने मुंह मोड़ा सड़क ने नाता तोड़ा।
जिसने नहीं माना उसे पुलिस ने तोड़ा।।
कई के लाल निशान तो कितनों के काले।
जो नहीं माने और थे चल पड़े मतवाले।।
घर ने अपना राशन देखा घरवाले ने पैसा।
खिड़की से कुछ ने देखा बाहर का तमाशा।।
फिर वही हुआ ग़रीबों की बली।
जगह थी वही अमीरों की गली।।
कोरोना को हौसला आया।
जब लोगों ने फिर से हाथ मिलाया।।
खुद से नवाज़े आलिमों को ज्ञान कहां।
कहा उसपे भरोसा रखो, है तेरा ध्यान कहां।।
लंबी लगी लाइन मस्ज़िद और मंदिरों में।
जो भूल बैठे थे कैद हो रहे थे जंज़ीरों में।।
एक कि गिनती चढ़ने लगी पायदान।
पड़ी रही तलवार और हाथ आया म्यान।।
चीख पुकार और हाहाकार मची।
नज़रों से जब कोई नहीं गली बची।।
क्वारेंन्टाइन का फिर नया बखेरा।
ये सोच के की होगा फिर नया सवेरा।।
अपनों के आंखों में आंसू, और दिल में डर।
चेहरे पे दिखने लगा साफ साफ असर।।
किसी घर ने लील लिया घरवाले को।
जब हुए बदकिस्मत एक एक निवाले को।।
ज़िन्दगी बचाने को जब उनकी फ़ौज निकली।
कहीं स्वागत तो कहीं गली में उन्हें दुत्कार मिली।।
देश चुपचाप जब लगा अपनी सांसे गिनने।
कॉलेज में डॉक्टर लगे नया सपना बुनने।।
चहुं और पसरे सन्नाटे में अकेला जनाज़ा गुज़रा।
फिर भी सन्नाटा एक कदम न उतरा।।
दरिये ने सांस ली और हवा को मिली रवानी।
याद आयी उन्हें बीती हंसी ज़िंदगानी।।
दश्त भी चुपचाप पसरा खुशी के गीत गाता।
अब इस राह कोई शिकारी का डर नहीं सताता।।
खबरों का जाल कोरोना से पटा रहा।
गंदी राजनीति और क्राईम से हटा रहा।।
धन्य देश अपना और ये अपनी धरती।
कुछ दिन लोग भूले मस्ज़िद और मंदिरों की मूर्ति।।
दरीचे से होता सलाम और राम राम।
मुस्कुराते लब को भी अब मिला था आराम।।
फ़ेसबुक और व्हाट्सअप से जारी हुए पैग़ाम।
ना आये कोई बाहर, ये सारी क़ौम के नाम।।
राज्य और केंद्र ने दिखाई एकजुटता।
कि देखें कैसे कोरोना का हौसला नहीं टूटता।।
लॉकडॉन बढ़ा थोड़ा और फिर थोड़ा।
ऐसे ही करके वायरस का हिम्मत तोड़ा।।
दिन इक्कीस न सही तो और सही।
इलाज़ तो यूँ ही ढूंढ लेंगे कहीं।।
सफर रुकी है 'सहर्ष' मगर चल दिये हैं।
है अंधेरा, मगर साथ हौसले के दीये हैं।।
मेरी जां है जहाँ जाऊंगा एक दिन।
भले काटने पड़े ये दिन गिन गिन।।



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