बराबरी कैसे?



देर से देखा या जल्दी पता नहीं

पर पता का पता मिल गया था 

शादी अभी हुई थी थोड़ी बाकी थी, 

लोग खाने पर टूट चुके थे 

किसी को खाने की 

किसी को पूरा वसूली की 

तो किसी को जल्दी लौटने की जल्दी थी, 

मेरे लिए असल था 

उस बेसिन को देखना 

जहाँ एक 5 बरस की बच्ची 

किसी तरह उचक उचक कर 

हाथ धोने की कोशिश कर रही थी 

जो उमर में उससे बड़े थे 

या बहुत बड़े थे 

बड़े आराम से 

आते और हाथ धोकर 

गडाडा, कुल्ला करके चले जाते थे 

मगर वो छोटी मासूम ! 

अब भी संघर्ष कर रही थी। 

मैं झट से जाकर

 उसका हाथ धुलवा दिया 

वो मुझे नहीं जानती थी 

शायद मेरे हाथ को जानती थी 

उसके चेहरे पर हैरत था 

पर संतोष भी। 

मैं विस्मित और भौंचक था

सोचकर सोच नहीं पा रहा था 

उस बेसिन की हाईट! 

उसके लिए उपयुक्त न था 

पर उसे भी उसी में धोना था

क्या यह बराबरी का मात्र ढोंग था? 

जहाँ उसके उमर 

उसके कद को 

अनसूना कर दिया गया था! 

या यूँ कहें कि नकार दिया गया था। 

या फिर उसे 

अनजाना सजा दिया गया था। 

या फिर, 

उसे उस बेसिन तक पहुँचने के लिए

अपने बड़े होने तक 

एक बड़ा इंतज़ार करना था! 

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