इस बार सोचा



 इस बार सोचा यार चुप रहूँ 

ये साल भी कट जाएगा 

धीरे धीरे। 

 ज़िंदगी में 

सारे दुख की वजह थी

 बोलना! 

 इस बार सोचा 

गलती क्यों दोहराना? 

 मगर आदत भी कोई चीज है! 

जाती नहीं, 

हाँ इतना यक़ीन है

 इस साल कम बोलूँगा

 अधिकतर चुप रह लूंगा 

उम्मीद है, 

फिर से साल का अंत आ जाएगा

 और दूसरा साल लग जाएगा 

इसी साल के, 

 आने जाने के दरमियाँ

 मेरी आदत भी बदल जाएगी 

और मुश्किलें  भी! 

  अब देखना है 

समय बीतना शुरू हुआ है 

मुश्किलें कब कम होती हैं! 

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