ख़ामोश शहर



 अब जब शहर ख़ामोश है तो क्या कहे

सांस रोकें और लबों से कुछ न कहे

जा तेरी चलती है चला जितनी मर्ज़ी

दिन के इंतज़ार में सिर्फ हम अकेले रहे 

देख वहाँ भी आवाज़ आवाज़ दे रही 

तेरे खुले कान और धड़कन न सुन रहे

हिसाब होगा तो गवाह तू होगा याद रख

बताना क्यों तू और सब ख़ामोश चुप रहे 

'सहर्ष' अंधेरे से लड़ते लड़ते मसरूफ थे 

उजाले की भनक न लगी हम मदहोश रहे 

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