वो दहाड़ता है

 सदियों से कीचड़ में 

फंसे दोनों पाँव को

 


नियति मान बैठने वालों मे से 

वो नही था

 खोजता था पथ वो जो

 अब तक बनाया न गया था

 बचपन से ही आँखों के तेज से 

वह अपने में अपनों से अलग था 

किंतु अपनों में भी वही अपना था 

कोई आये और उसे दबाए 

ये नियति मंजूर न था 

मिला जिसे पीटा 

डराया उसे जिसने डराया

 दौड़ाया उसे

 जिसने उसे उकसाया 

बचपन में ही बड़े ख्वाब और बड़ी बातें 

और फिर बड़ा होकर किया बड़ी बातें 

अपनी कथित जाति पर गर्व करना

 सिखाया जैसे बुर्किना के ट्राउरे ने बताया

गाँव गाँव में शहर शहर में 

राज्य राज्य में वह दहाड़ता है 

कल के सितमगर को ललकारता है 

ताल ठोककर मूछें लहराकर हुंकारता है 

बेखौफ़ भिड़ना लड़ना 

एक एक कर सबको सिखाया 

हो ज़ुल्म तो सहते रहेंगे ऐसा 

कभी नहीं सिखाया 

कहा काटे तो काट दो 

लहू सीना से उसके चीर दो 

फिर क्या हिम्मत किसी कि 

किसी पे कोई ज़ुल्म करे 

मिले हैं उसके सेना अब हर दर खड़े

गाँव की गली से निकल कर 

जन प्रतिनिधि बन चुका 

सत्ता को अपने लोगों के हित में 

अपने हाथ में ले चुका 

अब क्या समझें 

कि कब तक अंधकार रहेगा 

वह निकल चुका है सूरज को जगाने 

सूरज को लाकर रहेगा 


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