ग़ज़ल
सिरहाने तले नदी लेकर सोया हूं
सूखे लब को सिलकर सोया हूं
वो बुरा ख़्वाब फिर न आ जाए
ऐसे आंखों को खींचकर सोया हूं
कहीं ज़मीन कहीं पत्थर बिस्तर
आंख लगी भूला कहां सोया हूं
सच कहूं चौंक जाओगे 'सहर्ष'
रात जगा दिन भी नहीं सोया हूं
I see I think I mix I prepare and I make them appear in purified form that I call -POEM
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