कविता
बहार थमेगा कैसे जब
ये हवा चलती रहेगी
मेरी सांस थमेगी कैसे जब
वह यूं मुस्कुराती रहेगी
चांद फलक पर आएगा कैसे
दिन देर तक बढ़ती रहेगी
मंज़िल पर वो पहुंचेगा कैसे
सांस जब हर बार टूटती रहेगी
नादान को रास्ता दिखेगा कैसे
बार बार जब चिराग़ बुझती रहेगी
फिर दिलग्गी करेगा कोई कैसे
बार बार जब आस टूटती रहेगी
राम सीता का देश होगा कैसे
जब तलक अस्मत लूटती रहेगी
सब लोग मिलकर रहेंगे कैसे भला
हिंसा भावना जब तक पनपती रहेगी


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