अकेला चना

 अकेला चना अब अकेला नहीं रहा

कल छोड़ दिया था उसे 

उसके कुछ साथी के साथ


आज कई दिन बीत चुके हैं

उसका चुपके से बढ़ना

अंकुरण से पत्ते का निकलना

सब कुछ भी, नहीं


बस उसकी नई आकृति

नया रूप

नया रंग

नया भाव

नई महक

नए तेवर

सब नए।

कल का अकेला चना

आज अपनी जड़ पकड़ चुका था

कल का शुष्क 

आज खिला था

कल का प्रताड़ित

आज किसी का सुख था

समय निरंतर

लोग वही

ज़मीन वही

हवा वही

सब एक थे 

बस आज वो बदल गया था

थोड़ा नहीं

बहुत ज़्यादा

किसी को ग़म था 

किसी को खुशी

पर ये बात बिल्कुल

अलग थी, नई थी

उससे किसी को खुशी

किसी को हिम्मत

किसी को सबक

तो किसी को नई महक,

सबको कुछ न कुछ मिला था।

अब सवाल उसके बने रहने का

सवाल उसके खिलने का

उसके वजूद का

हमेशा मन के किसी कोने में

बैठा होगा।

एक अदने ने 

पैर के बल खड़ा होना सीख लिया 

अपने से मुस्कुराना सीख लिया

हार में भी जीत जाना सीख लिया।

कौन बचाएगा उसे?

कौन तोड़ेगा उसे?

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