ग़ज़ल
वो मेरा हमसफ़र मेरी हर बात समझता है
ज़ुबान कम आंखों को ज़्यादा समझता है
खल्क के सोहबत में आकर बदला मगर
हर बार मुझे ही वो अपना समझता है
कहा कई मर्तबा अब मुझसे दोस्ती नहीं
पर मुझे वो दोस्ती का रहबर समझता है
सुनाया उसे अपनी दास्तां भी जब 'सहर्ष'
बस वो जिंदगी को आसान समझता है।


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