देरी की ट्रेन
आज 25 था
मुझे 26 की जल्दी थी
मगर न 25 की
न 26 की किसी काम की
जल्दी रही।
25 की जल्दी से
मैं सहरसा छोड़
दानापुर आ गया
मगर यहां जल्दी
किसी काम का न था
गाड़ी पहले तो साढ़े सात घंटे
फिर
चौदह घंटे
और फिर
उन्नीस घंटे,
सारी जल्दी ढेर हो गयी
इसी देरी में
कोलाहल के प्लेटफॉर्म पर
कभी टहल बुल कर
कभी उच्च प्रतीक्षालय में
थोड़ी थोड़ी नींद
का नशा लेता रहा
26 की तारीख़
27 की तारीख़ में
तब्दील हो गया था
बड़े आसानी से
मगर यह वक़्त
गुज़रा बड़ी मुश्किल से।
अब गाड़ी
आकर खड़ी थी प्लेटफार्म पर
पर मन में
आगे के प्लान की चिंता थी
कुछ किए वादों का डर था।
क्योंकि ट्रेन देर नहीं
बहुत देर थी
अब शेष चलने के बाद
देखना है
कितनी जल्दी
कितने टाइम पर
जब यह चरलापल्ली पहुंचेगी।



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