एक कुल्फ़ी


 सालों से शायद

हो गया था आना जाना

नौशाद मोटर साईकल गेराज पर

बरियाही बाजार में

वो भी मैं अपने छुट्टी में

आ पाता था पापा की

गाड़ी की कमी को दूर करने

आज भी आया था

सोचकर कि

जल्दी काम हो जाएगा

मगर नहीं

ख़र्चा पिछले बार की तरह

ज़्यादा निकला

पिछले 3 हज़ार से तीन ज़्यादा

शायद थोड़ा ज़यादा था

जो बाक़ी पैसे थे

उसमें मार्केटिंग

घर पर मम्मी पापा के लिए

और फिर थोड़ा जेठानी के बच्चों

पर

और फिर अपने बहन बहन के बच्चों पर।

बाक़ी यह था

कि

सारा समीकरण  बदल गया था

ख़ैर वक़्त के साथ ये भी

फ़िलहाल मैंने

20 की कुल्फ़ी ले ली 

एक किशोर मैकेनिक के लिए

उसने तो अपने साफ कर रहे

काले गंदे हाथों से

पहले मना किया

फिर कुल्फ़ी 

उसके पास पहुंचने और

मेरे भी कहने और पहुंचने तक

वह थम गया 

उसके तर्क रुक गए

उसका न

हाँ बन गया

मैं फिर से कुल्फ़ी वाले को

सड़क से जाते देखने लगा

धीमें किन्तु लगातार कदमों के साथ।

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