दुकानदार
जबसे हमने देखा
यहाँ पर तीन दुकानें थीं
तीनों के सामान बिकते थे
तीनों में ही आगे पीछे था
फिर दो कहीं गुम हो गए
और एक का सिक्का जमने लगा
वो पेट बड़ा लिए दिन भर
दुकानदारी करता
जो भी बस में जाता
जो भी बस से आता
सब उसी के पास जाता
फिर क्या!
इसी की चांदी थी
इसी का सोना था
दो चार साल तक तो वही राजा
वही बादशाह!
मगर आज!
फिर से दो दुकान देखा
एक जो नया था वो
था शायद नया
मगर गंभीर
कुछ ही लोग
इधर आते थे
बाकी उधर जाते थे
वहाँ बैठी पुराने दुकान
की औरत खुश, न थी
कभी उस नये दुकान को
कभी उस नये दुकानदार को
कभी कभी उस पर जाने वाले
नये ग्राहक को देखती,
नयावाला हर्षित भी न था
मगर अति उत्साहित भी न था
अब एक की जगह
दो दुकानदार थे
एक के पास पुराना तज़रबा था
पुरानी पहचान थी
पुराने ग्राहक थे
इस नये शांत गंभीर दोस्ताना
को अभी पुराना होना था
ग्राहक बनाना था।



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