ग़ज़ल

 दिल की बात है तो दिल से बात करो

उजाले को छोड़ो अंधेरे में रात करो

गर है कोशिशें तो ग़म नहीं, छोड़ो

खिलाफ़-ए-उड़ती हवा के बात करो

आया है कोई समंदर या बवंडर, आए

तुम अपनी नहीं आवाम की बात करो

चले जाएंगे ये सब बूंद के बुलबुले भी

महफूज़ अपने घर को रखने की बात करो


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