ग़ज़ल



मुझको ज़माने की फिकर नहीं

ज़माने की मुझमें अकड़ नहीं

वो मिट्टी बही जा रही है देखो

दरख़्त का कोई जकड़ नहीं

वो रूठा चला जाएगा जाए

मुझे समझा है वो अगर नहीं

वाइज़ की बातों के बीच बोलेगा

चला शाम अगर ठहरा सहर नहीं

अभी बोलता है एक कोना 'सहर्ष'

रुको, अगर रुका ये शहर नहीं

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