चिटी और मकड़ा



चिटी को अपने पांव पर भारी वजन 

उठाते सुना था 

और उठाते देखा था

अनगिनत कहानियां भी सुनी थी

मन खुश था और दुनियां थमी थी

यही सोचकर

कि सब कुछ सही है

सब कुछ यही है।

आज कुछ अलग देखा

सबसे जुदा देखा

थोड़ा ज़्यादा देखा

थोड़े में बहुत देखा

बहुत में भी कम देखा

एक मकड़ा को

ठीक चींटी के तरह

भार से लदे

मगर पतले अदृश्य से

पांव के दम पर

भार को उठाए ले जाते देखा।

जिधर चाहता था उधर,

न कोई रुकी मंजिल थी

न ही उन पैरों को 

रुकावट पसंद था।

कभी इस दीवार 

कभी उस दीवार पर

कभी छत से यहां उल्टा चला तो कभी

वहां झूमता चला।

क्या लोग

अब मकड़े की भी बात करेंगे?

उनकी कहानी में भी

बच्चे जागने वाले रात करेंगे?

कहानी 

दोनो की अलग है

कहानी दोनो की एक है।

किसी के लिए एक है

किसी के लिए एक जैसी है।

किसी की प्रेरणा है

किसी की ईर्ष्या है।


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