ग़ज़ल

 

अब तेरे मेरे बीच फासले हो गए

बात फिर कुछ बिन कहे हो गए

आदत थी सलाम की नागाह 

हाथ उठे मगर गिरे रह गए

ज़ुबांबंदी का सबब समझते होंगे

वर्ना आप चीखे, वो चुप रह गए

चलो कि कदम दूर मंज़िल 'सहर्ष'

रास्ते सारे तिरे कदमों में रह गए

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