नाश्ता छूट गया

 लक्ष्य दिशाहीन न हो

मन में बनाए रखा

रात को नींद में भी

खुद को आज

देर तक जगाए रखा

नींद थी आंखों पर

पर लक्ष्य सामने

जैसे तैसे सोया

जैसे तैसे जागा

पौ फटते ही बस स्टैंड पर

एक स्टैंड से दूसरे स्टैंड पर

फिर लक्ष्य के रास्ते पर

स्टैंड पर गाड़ी 

गाड़ी में बैग

बैग पर नज़र

कभी गाड़ी पर नज़र

फिर पेट के भूख पर नज़र

बस नज़र पर नज़र

फिर नज़र की नज़र

पेमेंट किया 

पार्सल की आस में 

पार्सल की देरी

बस चलने की जल्दी

दोनों के बीच मैं और नाश्ता

फिर नाश्ता और गाड़ी के बीच

छोड़ दी पार्सल 

आ दौड़ा बस में

इस दौड़ में

नाश्ते की दौड़ छूटी

लक्ष्य की दौड़ जीत गई

बस नाश्ता छूट गया

बस नाश्ता छूट गया।


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