खिड़की के बाहर बच्ची
मैं ट्रेन में था
ट्रेन पटरी पर
भाग रही थी
और मैं बैठा था।
खिड़की के बाहर
एक आंख थी
रुकी सी थमी सी
पर क्षणिक गतिशील
उसकी आंखें दौड़ी
एक बार ट्रेन के
इंजन से अंतिम बॉगी तक
ट्रेन गुज़र रही थी
साथ उसके अरमान भी
कुछ क्षण में
ट्रेन को गुजरना था
मगर उसके अरमान
बहुत बड़े अरमान
को सदियों की दूरी
तय करनी थी
6 साल की अवस्था से
जवानी तक
या फिर आधे केशौर्य तक
कोई नहीं जानता
शादी के बंधन में
कब बांध दी जाएगी
कोई नहीं जानता
कोई नहीं जानता
उसके अरमान कब
उड़ान भूल जाएंगे
कब उसके पंख
अवस्था से पहले
बेकार के ख्वाहिशों से
चुपचाप जकड़ जाएंगे
और वो भूल जाएगी
उसके अरमान
उसके बड़े अरमान
शायद
कभी पूरे न होने वाले अरमान।


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