साहब मज़दूर हूं
साहब मज़दूर हूं
मजबूर हूं
दूर से घर आया हूं
किसी बड़े शहर से
अपने घर आया हूं
कमाया हूं बहुत
साथ में कम लाया हूं
क्या कमाता हूं
क्या बचता है
वो शहर
और मेरा घर जानता है
बाक़ी सब हमको
कमाता खाता जानता है
एक एक पैसा के साथ
जुड़ा हर अरमान होता है
ज़्यादा ख्वाहिश के साथ
कम सामान होता है
आते समय पैसे की छोटी गड्डी
जाते समय उधार की मुठ्ठी
साहब मज़दूर हूं
मजबूर हूं
कुछ तो ख्वाहिश से
कुछ बेबसी से
हमें उतना पढ़ना नहीं आया
बस इतना नोट गिनना आया
साहब मज़दूर हूं
मजबूर हूं
दूर से घर आया हूं
किसी बड़े शहर से
अपने घर आया हूं
कुछ पैसे किराए में
कुछ राह खर्चे में
साहब मज़दूर हूं
मजबूर हूं।




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