ऐसे बढ़ी मैं (कविता)










राहगीरों के नज़रों से दूर
छुपी रही मैं कहीं सुदूर।
किनारे सड़क के कहीं पड़ी रही
एक दिन बढ़ने की उम्मीद में खड़ी रही।
मुझे वक़्त लग रहा था
कटता पल सख़्त लग रहा था।
सब आ रहे थे आगे, 
मन में मेरे भी था कि भागे।
थी लाचार बस पड़ी हुई
अंधेरे में कहीं खड़ी हुई।
कभी बूंदा-बांदी  तो कभी धूप
कभी भींगती कभी जाती छूप।
हाय, अब क्या करूं रहता मन में अड़चन
गुमनाम से कैसे बन जाऊं कंचन।
रही अधीर पर धीरे धीरे
बढ़ती रही मैं तीरे-तीरे।
आज सदियाँ बीती तमस का
आया था जोबन ओजस का
सुघर शाखा,उज्ज्वल फूल
दृष्टिपाटकर्ता स्वतः जाता भूल।
पास बढ़े और भी थे
देखने को काबिले गौर भी थे।
मौसम आये मौसम गए
मैं खिली रही सब मुरझा गए।
मन मुस्काती अतीत देखती
और ज़मी में गड़े जड़ को देखती।
दुःख का आना जैसे उसका जाना
सीखा नहीं कभी घबड़ाना।
आज नाम न हो अंधियारे में
कल तू ही चमकेगा उजियारे में।



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