देखा देखी (कविता)
देखा देखी भी अजब हुआ
बीमारी जैसे छुआ छूत हुआ।
एक अदना से बालक भी इतना
नही जानता बड़ा भी जितना।
एक दूसरे की देखा देखी
कहीं न ऐसी अनोखी देखी।
एक खा रहा था बड़े चाव से मिठाई
किसे पता था बनेगी यही लड़ाई।
उसे अमीरी की गर्मी भला कब तक
फेंक दिया मिठाई वो गरीब हठी तब तक।
भला देखा देखी में किसकी भलाई
व्यर्थ छिड़ गई ऊंच नीच की लड़ाई।
कर्म फल भी सामने आ खड़ा हुआ
एक की गर्दन ऊंची, दूजे का झुका हुआ।
एक मां पड़ी सोच में हाय अब क्या करे
दूजा इंतज़ार में आये कोई और नखरे।
हाय रे देखा देखी छीन गयी कैसे हंसी
दुनिया देखो इसी में फंसी।



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