टपकती बूँद (कविता)








एक कोने में बैठ
सोच पाना बहुत आसान होता है
सूखी अलसायी धरती को भिगोने को
कैसे बैठा सारा आसमान होता है।
कहीं हँसी,
तो कहीं क्रंदन की शहनाई
मातम का पहाड़ टूट पड़ता है
ऐसा भी कर जाता है रहनुमाई।
कतरे में नज़र आता
 ये विप्लव जहां,
कभी रूकता, कभी चलता करते चुहुलबाजियाँ
अंदेसा नहीं जहां,
मातम बरसाता है वहाँ।


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