कैसे रुक जाऊँ (कविता)

सोचता हूँ बैठे बैठे देखकर किसी को
मैं भी बैठ जाऊँ।
बहुत हुआ काम अब
मैं भी बैठ जाऊँ।
मंज़िल है दूर अभी, लोग सुसता रहे
मैं भी बैठ जाऊँ।
काम कर लेगा कोई, और है बैठा कोई
मैं भी बैठ जाऊँ।
इतिहास उसने बैठ कर भी लिखा
मैं भी बैठ जाऊँ।
सोचा तो ऐसा ही
यही रास्ता सही।
पर ना आया दिल को तसल्ली कोई
उड़ा गया जैसे अपना मज़ाक कोई।
उठकर हम भी चल दिये
साथ थे जो अलसाए उसे छोड़ दिये।
यूँ नही मुमकिन नाम कर पाना
अब तो होगा खुद को आजमाना।
आए पैग़म्बर और कह गए
ज़िंदा वो रहे जो सब सह गए।
कल को न कहना नही पाया कुछ
हाथ मले, हाथ न आया कुछ।
उठ देख चराग़ जो जल रहा
ले चलने को तुझे मचल रहा।
बस फिर क्या
जैसे मिला रास्ता नया।
थके कदमों में जान आ गयी
बुझी आंखों में आन आ गयी।
कदम बढ़े बढ़ते रहे
सफलता कदम चूमते रहे।

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