सपना शेष (कविता)

अपने जन्मदाता का आभारी
किस्मत मेरी,
मैं ही तेरा उत्तराधिकारी।
मशीन सा चलना दिन भर यहां चुपचाप
कभी सोचता हूँ
क्या किस्मत गयी मेरी मारी?
बचपन कब खो गया
जाने कहाँ,
में स्थिर इसे ढूँढूँ अब कहाँ-कहाँ?
यकसां आकर मेरे हमउम्र
मांग जाते कुछ यहां
देखकर उन्हें अक्सर खो जाता हूँ जाने कहाँ।
मन्द मुस्कान की आभा आ जाती है
सोच कर घर अपना
जिसकी ख़ातिर बस शेष सपना।
कभी देखकर किताब कॉपी
पढ़ने को जी करता है,
दूसरे ही क्षण
घर का हाल धर पकड़ता है।
उम्र भी बढ़ती जा रही
निरक्षर रह जाने का डर सता रही,
क्या हो कुछ हो जाए
काश चाहत पूरी हो जाए।

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