वो पत्ता
गाँव में
खेत खलिहान में
सड़क पर
दरवाज़े पर
घर के आँगन में
ओसारे पर
गाय के पास
बकरी के पास
घास पर
घास के गठरी में
उसे
अक्सर देखा
मैं गाँव में रहता हूँ न
मुझे बहुत पसंद है
यह मेरे, हमारे जीवन का हिस्सा है
बकरियों को खाते देखा
पत्ता बटोरने वाली को देखा
मगर एक पत्ता!
कभी ख़्याल में नहीं आया।
उसके अहमियत पर नज़र नहीं दौड़ी।
आज एक स्टेडियम में बैठा था
सर के उपर पत्तों के साथ पेड़,
पेड़ के ऊपर खुला बड़ा आसमान
आसमान से आती तेज धूप!
तब एहसास हुआ, एक पत्ता का।
उन सब एक पत्तों के साथ होने का असर।
यहाँ जादू था।
यहाँ ज़िंदगी की सीख थी।
आराम था,
सुकून था,
शांति थी
सब उस पत्ते के बदौलत।
धूप में छाँव दिया,
बारिश में आसरा दिया,
सब कुछ दिया,
उसे अंतरमन से नमन!



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