मैं क्या हूँ?
मैं गेहूँ हूँ,
नहीं नहीं
मैं गेहूं का दाना हूँ।
अरे नहीं
मैं अनाज हूँ।
नहीं नहीं
मैं आटा हूँ
नहीं नहीं
मैं रोटी हूँ,
पराठा हूँ,
पूरी हूँ,
बाटी हूँ,
लिट्टी हूँ,
सब भ्रम...!
कभी इसे हाथ
कभी उसके हाथ
कभी यहाँ
कभी वहाँ,
कभी दुकान
कभी घर
कभी सड़क,
पर मेरा कोई असली ठिकाना नहीं!
बस नाम कई,
और अंत में,
मैं कुछ नहीं!
मुझे खा लिया जाता है
मेरा नाम, निशान!
सब मिट जाता है।
सोच शेष-
मैं क्या हूँ?



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