एक चींटी थी
एक चींटी थी
चींटी होना उसकी ग़लती नहीं थी
ग़लती थी पेड़, जंगल, पहाड़, झाड़ी को छोड़कर
पैदल रास्ते पर चलने की
अपने सीमाओं से बाहर झांकने की
बाहर निकलने की।
आते जाते लोग
जो इनसे कई गुणा बड़े थे
न उन्हें ख़बर थी
न अनजान गतिशील उनके कदमों को
वह चींटी भी तो शायद बेखबर था
उसे कुछ पता न था
मौत आयेगी और झटक जाएगी
अगले ही पल,
वह एक पाँव के नीचे दब गया
वो थोड़ा भाग गया
और थोड़ा बच गया,
दो पाँव तो बचा लिया
बाकी चार खो बैठा।
शक्तिशाली, अधीर, दुख दर्द से अधमरा हो गया था
मौत शायद मुस्की दे रहा था
दूर से।
बाकी चीटियों की किस्मत अच्छी थी शायद,
वो बचे थे।
अपने शेष कदमों से
कभी वृत बनता तो कभी सीधी तिरछी रेखाएँ
और फिर कुछ क्षण में
शायद ये वृत ये रेखाएँ फिर
अपूर्ण रहने वाली थी
वह धीरे धीरे शांत होने लगा था
सांस उखड़ने लगी थी
आँखें बंद होने लगी थी।



Comments
Post a Comment