ये शहर इतना खामोश क्यों है
किसी से कुछ न कहता क्यों है
माना के मैं इस शहर का नहीं हूं
पर मुझसे कोई न पूछता क्यों है
माना शाख़ से पत्थर ने तोड़े फूल
पर कोई यहां सवालिया न क्यों है
कहे दरिया सी ज़िन्दगी है हमारी
फिर मोड़ से आदम उलझता क्यों है
राह का हर मुसाफ़िर मंज़िल का हक़दार
फिर मंज़िल से पहले वो छूटता क्यों है
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