इन परिंदों को देखिए जनाब


 

इन परिंदों को देखिए जनाब

इनका कोई ठिकाना नहीं, कोई मजहब नहीं।

हम इंसान भूल चुके मौत ही अपना ठिकाना

इंसानियत ही अपनी मजहब।

देते हैं ग़म दूसरों को, मनाते हैं जश्न अदावत का

मज़लूम और मग़रिब देते आवाज़ अपनी बग़ावत का।

कौन सुनेगा उनको किसको उनकी फ़िकर है

दुनियाँ कान लिए बैठी ख़ामोश बेअसर है।


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