कोयल की कूक

 


मार्च का माह बीतने को है

अब जाकर 

अनायास ही

कोयल ने किसी 

डाल से 

कूक की 

आवाज़ लगाई।

क्षणमात्र में ही

मैं

किसी वन में पहुँचा,

चुपचाप सन्नाटे में

और बसंत के उस आहट

को बैठा निस्पंद 

सुनने लगा।

फिर जीवन के भागदौड़

का ग़ुलाम 

मैं भी भागने लगा।

फिर बाक़ी कलह

की आवाज़ें 

बार बार आने लगी

मंद पड़ती उस कोयल की 

कूक के साथ।

मन शांत 

हो चला था

जीवन के हलचल

में फिर से अशांत होने के लिए।


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