बैलगाड़ी
आज भागती
चीख़ती चिल्लाती
सनसनाती सिहराती
तपती
सड़क पर
मुझे खुशी हुई,
अतिरेक
बहुत ही अतिरेक।
अपना अतीत
मेरे सामने नाँच उठा
यूँ ही बरबस।
वो धूल से सने पाँव
गठरी लेकर
भागना उसके पीछे,
पाकर दया
बैल को धीमा करना
मन को ज़्यादा तसल्ली मिलना
और फिर
पीछे बांस को पकड़कर
चुपचाप बैठ जाना
और बस आगे आती
छूटती सड़क को देखते रहना
कभी धूल पर पहिया
कभी पहिया धूल में
यूँ ही सफर का कट जाना।
सब धूमिल हो गए
जब सामने से
आज गुजरी
एक बैलगाड़ी।



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