मैं क्या गुनाह करता हूँ (कविता)


मैं क्या गुनाह करता हूं?
 मैं तो बस बेबसों को बेबस करता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं?
उन्हें है जरूरत कोई सहारा मिले,
मैं देता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं?
आते हैं या लाए जाते हैं,
बात दोनों ही सही है,
या दोनों ही गलत।
बस उनसे थोड़ा व्यापार करता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं?

समाज के, देश के जो बड़े हैं,
उनकी सेवा करता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं?
माना उनके आंसू दर्द का जिम्मेदार मैं उनका एक बस,
मैं ही मरहम भी।
मैं क्या गुनाह करता हूं?
मैं छोड़ भी दूं,
कोई दूजा उसे नोंच ले जाएगा,
मैं बचाता हूं उसे।

भले काली कोठरी में सड़ाता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं?
जब तक है जोबन मेरे काम की,
फिर उसे बगल करता हूं।
भाई मैं भी व्यापार करता हूं।
मैं क्या गुनाह करता हूं? 
चलो बात उघड़ गई तो क्या,
आएगी पुलिस, पड़ेगा छापा।
हम कैद में,
फिर खिलाकर कागज, 
होंगे बाहर। 
यहां नहीं, दुकान कहीं और सही। 
कर लूंगा। 
बोलो, मैं क्या गुनाह करता हूं? 
तुम सब हो खोखले। 
आज पढ़ोगे कल भूल जाओगे। 
मैं इनका साथ निभाता हूं। 
मैं क्या गुनाह करता हूं?

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