हां फिर कभी (कविता)
हां फिर कभी रुकूँगी
यह वादा करती हूं।
यहां रुकना मुझे,
ज़रा अच्छा नहीं लगता।
यह जो नुक्कड़ है,
और इस नुक्कड़ पर जो,
तुम्हारी दुकान है,
दोनो हिसाब करते हैं,
मेरी मुश्किलों का।
मैं तुमसे,
कुछ नहीं कह पाती।
क्या करूँ,
बंदिशे सारी बनी,
जैसे मेरे ही लिए।
तुम्हारा क्या,
तुम तो मर्द हो,
कोई भी बात,
हँसी में टाल जाओगे।
जो बीतेगी,
उसे हम चुपके से,
आँसू में बहा जाएँगे।
तुम्हें तो अपने सुख की पड़ी है,
मेरा क्या,
मैं तो झेलने के लिए ही बनी हूँ।
न ठौर है, ना ठिकाना,
बस चलते जाना है।
कहने को घर में हैं,
सब अपने नाम के,
बाक़ी सब पराए हैं।
पता है मुझे तेरा,
मुझे छुप कर देखना।
ऐसा नहीं मैं बेसुध हूँ।
बस, घूंघट की कदर बाक़ी है।
हाँ फिर कभी, सेकना आँखें अपनी
आज मेरी माँ बीमार है,
ज़रा जल्दी दे दो सामान।
चलूंगी फिर,
सबसे नज़रें बचाए,
वो सब जो दूर,
रहते हैं खड़े,
मुझ पर नज़र गड़ाए।
मेरे वो भी आएंगे,
मिट्टी में सने।
लगेंगे मुझपे रौब जमाने।
चलती हूँ,
मेरी बेबबसी,
तेरी आज़ादी है।





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