जरा ठहरो (कविता)


         हो तुम इंसान, इंसानियत के लिए।
 यह हैवानियत कहां से आ गई ?
 जलता है तेरा अपना कोई और 
तू खुश हुआ, 
यह रूमानियत कहां से आ गई ? 
सुना है, तू देवता को आवाज़ लगाता है,
 सुना है तू उसके गुण गाता है,
सुना है तुझ में कई गुण हैं, 
पर जब खुली सड़क पर,
 किसी अंधेरे में चुपचाप,
 जब कहीं चीख गूंजती है,
सन्नाटा में कोई दम तोड़ देता है।

जिंदगी की बाजी हार जाता है।
तब तुम कहां होते हो ?
तुम्हारी पूजा कहां होती है ?
और तुम्हारे भगवान कहां होते हैं ? 
क्या सब यह ढोंग है,
 या है सच्चाई ?
 या फिर कोई जिस्म नहीं,
 बाकी है परछाई।
 सुन, क्या फर्क पड़ता,
 अगर तेरा अपना ही तुझसे बिछड़ जाए।
 अगर तेरा अपना ही सन्नाटे में गुम हो जाए।
 क्या हो तेरी ऐसी प्रार्थना की, 
जिसमें कोई ताकत ना आए।
 क्या हो ऐसे दिखावे का,
 जिससे किसी का भला ना हो।
 क्या हो ऐसे छल का,
 जो तेरी प्रार्थना पर धब्बा हो।
 कई इतिहास, कई ग्रंथों को तुमने,
 लिख दिया।

 कई चेहरे, कई शक्तियों को,
 तुमने गढ़ दिया।
 क्या हो अगर सच्चाई जनमानस को पता चले ? 
क्या हो अगर लोग इस सच्चाई पर चल पड़े ? 
हां, तुम्हें, हो ना हो पर मुझे यकीन है,
 यह दुनियाँ, जात-पात, रंगभेद,
 ऊंच-नीच, अमीर-गरीब,
 कमजोर-मजबूत के बंधनों से, 
मुक्त हो जाएगा ।
और फिर यह धरती फिर से,
 खुश हो जाएगी।
 प्रकृति की छटा, 
फिर से खिल उठेगी।

 तुम्हारी खुशियां,
 सबकी खुशियां,
 फिर से दोगुनी हो जाएगी।
 वह रामराज,
 जो किसी ने शायद देखा, 
या शायद इसकी कल्पना है।
 वह हकीकत में, 
तुम्हारे आंखों के सामने होगा।
 फिर ना भाई-भाई में,
 झगड़ा होगा।
 ना किसी मां-बाप का अपमान होगा।
 ना किसी की जमीन छिनेगी। 
ना किसी की हत्या होगी।
 ना किसी को अभिमान होगा।
तो,
क्या हो जागने के लिए तैयार!
 या फिर अपने चैन की बांसुरी बजाओगे।
बात मानो,
 या ना मानो।
वह दिन तो जरूर आएगा।
 जब हर जगह शांति पैर पसार जाएगा।
 सूखे लव पर नमीं आ जाएगी।
पीले पड़े चेहरे,
 खिल उठेंगे।
 रूकती, चलती सांसे, फिर से दौड़ पड़ेंगे।

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