वो (कविता)

वो जो चल रही है,
आज उदास,
परेशान, सड़कों पर, 
जिसका ना कोई घर है, 
ना कोई ठिकाना।

तुम्हें हंसी आती है, 
तुम हंसो।
शायद, तुमने यही सीखा है।
किसी के बदकिस्मती पर मुस्कुराना, ठहाका लगाना, क्या तुम्हें नहीं लगता? उसने भी देखा होगा, 
जवानी के वसंत कई। 
मुस्कुरायी होगी, 
मस्तियां छाई होंगी। 

लोग आए होंगे कहने उसे, 
कि वह लग रही है कोई रूप की परी सी।
पर आज है, 
उसकी तबीयत कुछ खराब सी। 
ना हमें फिकर है, 
ना तुम्हें फिकर है।
पर है तो वह कोई औरत ही।
होगी किसी की अपनी सगी भी।
पर आज है वह सबसे अलग, 
सबसे जुदा, सबसे अकेली। 
क्या हमें है उस पर हंसने का हक? 
क्या वह बनी है, बस इसी काबिल? उसके बनने में क्या हमारा भी हाथ? कभी सोचा?
जरा सोचिए।
अरे वह है,
हमारे ही बीच की चुनाव। 
अपने हाथ उसकी तरफ बढ़ाएं। 
जो मजबूरियां है उसकी,
जो बेबसी है उसकी। 
क्यों नहीं दूर भगाएं? 
क्या पता हमारी सोच, 
आपकी सोच बन जाए,
फिर से उसके मुस्कुराने का सबब। 

तो आइए चलते हैं, 
पूछेंगे उससे, 
जिसे कोई पूछता तक नहीं, 
उसकी जरूरत की चीजें देंगे। 
उसे, 
जिसे कोई भीख समझ कर देता है।उसके पास बैठकर करेंगे बातें, 
जिससे हर कोई दूर भागता है। 
उसकी बातों को सुनेंगे हम, 
जिसे हर कोई दुत्कारता है, 
और फिर मुस्कुराएगी, 
दो जिंदगी,
एक हमारी या आपकी, 
और एक उसकी।

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