देखो भाई (कविता)

 

देखो भाई, साहब आए हैं।
न जाने क्या संदेशा लाए हैं।
अरे ज़रा ठहरो, साहब को बैठने तो दो। 
तुम लगे बोलने, 
साहब कुछ बोलने तो दो। 
कितने सालों बाद आए हैं,
और अपनी फरियाद लाए हैं।
"इस बार हम ही को जिताना,
और हम ही को जिताना।"  
अरे भाई, ज़रा देर ठहरो।
क्यों लगे हल्ला मचाने?
देखते नहीं, साहब आए हैं।
न जाने क्या संदेशा लाए हैं।
अरे-अरे,अरे रुक  जाओ।
पहले साहब को बैठने तो दो। 
अरे तुम क्यों हाथ जोड़ लिए ?
साहब को हाथ जोड़ने तो दो। 
क्यों आगे बढ़ गए ? 
साहब को आगे बढ़ने तो दो। 
एक तुम्हारा ही घर नहीं इस गांव में,
और भी घर हैं। 
अरे इनको यहां गर्मी लगती होगी, 
इनके बड़े घर शहर में हैं।
यह आएंगे यहाँ तभी,
जब इनको वोट चाहिए होगा कभी। 
अब क्या करोगे?

भरोसा तो बस इन्हीं का है, 
और यह समाज, यह लोग तो सब इन्हीं का तो है।
ये कहते हैं, "हम तुम्हारे हैं",
"हम तुम्हारे हैं।"
अब देखो, ना बिजली है,
ना शिक्षा है, ना सड़क है,
ना पानी है। 
बस, हम तुम्हारे हैं।
तो क्या सोचा आपने ? 
ऐसे ही चलेगा, 
और क्या वोट ऐसे ही पड़ेगा?
ज़रा आप भी सोचिए,
क्या है हकीकत, देखिए।

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